Saturday, May 1, 2021

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने
जब जैसी, जिस रूप में मिली
खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना...

वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम
लेकिन उसे आता है रिश्तों को गढऩा और पकाना
घर की दरारों में कब भरनी है चुपके से भरावन
जानती है वह...

तुम कविता के लिए बहाने तलाशते हो
वो किसी भी बहाने से रच लेती है कविता
तुम शोर मचाते हो एक कविता लिखकर
वो ज़िन्दगी लिख कर भी ख़ामोश रहती है

रातभर जागकर जब तुम इतरा रहे होते हो
किसी एक कविता के जन्म पर
वो सारी रात दिनभर लिखी कविताओं का हिसाब करती है
कितनी कविताएं सब्जी के साथ कट गईं
कितनी ही प्याज के बहाने बह गईं
और कितनी ही कविताएं सो गयी तकिये से चिपक कर

कड़ाही में कभी हलवा नहीं जला...
जलती रही कविता धीरे धीरे
जैसे दूध के साथ उफन गए कितने अहसास भीगे से
हर दिन आँखों से बहकर गालों पे बनती
और होठों के किनारों पर दम तोड़ती है कविता
तुम इसे जादू कहोगे
हाँ सही है, क्योंकि यह इस पल है
अगले पल नहीं होगी
अभी चमकी है अगले पल भस्म होगी

रात के बचे खाने से सुबह नया व्यंजन बनाना
पिछली रात के दर्द से नयी कविता बना लेना
आता है उसे...

और तुम कहते हो
उस घरेलू स्त्री को कविता की समझ नहीं!

Friday, April 30, 2021

From The Long Sad Party / Mark Strand

Someone was saying
something about shadows covering the field,
about how things pass,
how one sleeps towards morning
and the morning goes.

Someone was saying
how the wind dies down but comes back,
how shells are the coffins of wind
but the weather continues.
It was a long night
and someone said something
about the moon shedding its white
on the cold field, that there was nothing ahead
but more of the same.

Someone mentioned
a city she had been in before the war,
a room with two candles
against a wall, someone dancing, someone watching.
We began to believe
the night would not end.

Someone was saying
the music was over and no one had noticed.
Then someone said something
about the planets, about the stars,
how small they were, how far away.

Thursday, April 29, 2021

Oh Where / David Berman

Where did you go, my dear, my day;
Where, oh where, did you go?
To market, to maker of market, to say
Too much of the little I know.

Where did you go, my dear, my year;
Why did you flee from me?
I went from here to there to here
Loitering breathlessly.

Where did you go, my life, my own,
Decades gone in a wink?
Some things are better left unknown
Some thoughts too thick to think.

Wednesday, April 28, 2021

निराशावादी / रामधारी सिंह "दिनकर"

पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा,
धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास;
उड़ गया भाप बनकर सरिताओं का पानी,
बाकी न सितारे बचे चाँद के आस-पास ।

क्या कहा कि मैं घनघोर निराशावादी हूँ?
तब तुम्हीं टटोलो हृदय देश का, और कहो,
लोगों के दिल में कहीं अश्रु क्या बाकी है?
बोलो, बोलो, विस्मय में यों मत मौन रहो ।

Tuesday, April 27, 2021

कंठ जल रहा है / दीनानाथ सुमित्र

गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है

सुना नहीं पंछी का गाना
रात अँधेरी बनी ठिकाना
सुख का जाना दुख का आना
रोज चल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है

प्यार बिक रहा, यार बिक रहा
दवा संग बीमार बिक रहा
निष्ठुर है आभार बिक रहा
नहीं खल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है

लुप्त हो गई है चेतनता
कहाँ खो गई नम्र-नम्रता
मरी-मरी-सी है सज्जनता
जीत छल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है

मार्ग कठिन है लक्ष्य न दिखता
टिकने वाला वक्ष न दिखता
ताज न दिखता तख्त न दिखता
सत्य गल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है

Monday, April 26, 2021

Present / Sonia Sanchez

This woman vomiting her
hunger over the world
this melancholy woman forgotten
before memory came
this yellow movement bursting forth like
coltrane's melodies all mouth
buttocks moving like palm tress,
this honeycoatedalabamianwoman
raining rhythm to blue/black/smiles
this yellow woman carrying beneath her breasts
pleasures without tongues
this woman whose body waves
desert patterns,
this woman wet with wandering,
reviving the beauty of forests and winds
is telling you secrets
gather up your odors and listen
as she sings the mold from memory.

there is no place
for a soft / black / woman.
there is no smile green enough or
summertime words warm enough to allow my growth.
and in my head
i see my history
standing like a shy child
and i chant lullabies
as i ride my past on horseback
tasting the thirst of yesterday tribes
hearing the ancient/black/woman
me, singing hay-hay-hay-hay-ya-ya-ya.
hay-hay-hay-hay-ya-ya-ya.
like a slow scent
beneath the sun
and i dance my
creation and my grandmothers gathering
from my bones like great wooden birds
spread their wings
while their long/legged/laughter
stretched the night.
and i taste the
seasons of my birth. mangoes. papayas.
drink my woman/coconut/milks
stalk the ancient grandfathers
sipping on proud afternoons
walk like a song round my waist
tremble like a new/born/child troubles
with new breaths
and my singing
becomes the only sound of a
blue/black/magical/woman. walking.
womb ripe. walking. loud with mornings. walking.
making pilgrimage to herself. walking.

Sunday, April 25, 2021

आप का ए'तिबार कौन करे / दाग़ देहलवी

आप का ए'तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे

ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते
पर तुम्हें शर्मसार कौन करे

हो जो उस चश्म-ए-मस्त से बे-ख़ुद
फिर उसे होशियार कौन करे

तुम तो हो जान इक ज़माने की
जान तुम पर निसार कौन करे

आफ़त-ए-रोज़गार जब तुम हो
शिकवा-ए-रोज़गार कौन करे

अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद
दाना दाना शुमार कौन करे

हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊँ
मौत का इंतिज़ार कौन करे

आँख है तर्क-ए-ज़ुल्फ़ है सय्याद
देखें दिल का शिकार कौन करे

वा'दा करते नहीं ये कहते हैं
तुझ को उम्मीद-वार कौन करे

'दाग़' की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...