Saturday, January 27, 2018

Wonder / Ibn Arabi

Wonder,
A garden among the flames!
My heart can take on any form:
A meadow for gazelles,
A cloister for monks,
For the idols, sacred ground,
Ka'ba for the circling pilgrim,
The tables of the Torah,
The scrolls of the Quran.
My creed is Love;
Wherever its caravan turns along the way,
That is my belief,
My faith.

Friday, January 26, 2018

तराना-ए-हिन्दी / अल्लामा इक़बाल

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा ।

ग़ुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा ।

पर्वत वो सब से ऊँचा हम-साया आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा ।

गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदियाँ
गुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनाँ हमारा ।
आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ को
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा ।

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा ।

यूनान मिस्र रूमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा ।

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा ।

'इक़बाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्द-ए-निहाँ हमारा ।

Thursday, January 25, 2018

I Cannot Live With You / Emily Dickinson

I cannot live with you,
It would be life,
And life is over there
Behind the shelf
The sexton keeps the key to,
Putting up
Our life, his porcelain,
Like a cup
Discarded of the housewife,
Quaint or broken;
A newer Sevres pleases,
Old ones crack.
I could not die with you,
For one must wait
To shut the other's gaze down,
You could not.
And I, could I stand by
And see you freeze,
Without my right of frost,
Death's privilege?
Nor could I rise with you,
Because your face
Would put out Jesus'.
That new grace
Glow plain and foreign
On my homesick eye,
Except that you, than he
Shone closer by.

Wednesday, January 24, 2018

छैय्याँ छैय्याँ / ग़ुलज़ार

Yesterday I shared the Baba Bulleh Shah's popular Punjabi folk song 'Tera Ishq Nachaiya' aka 'Thaiya Thaiya'. Singer Sukhwinder brought this song to AR Rahman, and in no time none other than Gulzar was put to task to rewrite this popular folk for a Bollywood lyric. Thus came into being one of the most memorable song of Indian cinema.

जिनके सर हो इश्क़ की छाँव

पाँव के नीचे जन्नत होगी
चल छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ

सारे इश्क़ की छाँव, चल छैय्याँ छैय्याँ
पाँव जन्नत चले, चल छैय्याँ छैय्याँ
चल छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ छैय्याँ

वो यार है जो खुशबू की तरह
जिसकी ज़ुबाँ उर्दू की तरह
मेरी शाम रात, मेरी क़ायनात
वो यार मेरा सैंय्या सैंय्या
चल छैय्याँ छैय्याँ...

गुलपोश कभी इतराये कहीं
महके तो नज़र आ जाये कहीं
ताबीज़ बना के पहनूँ उसे
आयत की तरह मिल जाये कहीँ
वो यार है जो ईमाँ की तरह
मेरा नग़मा वही, मेरा कलमा वही
मेरा नग़मा नग़मा, मेरा कलमा कलमा
यार मिसाल-ए-आस चले
पाँव के तले फ़िरदौस चले
कभी डाल-डाल, कभी पात-पात
मैं हवा पे ढूँढूँ उसके निशाँ
सारे इश्क़ की छाँव...

मैं उसके रूप का शहदाई
वो धूप - छाँव सा हरजाई
वो शोख का रंग बदलता है
मैं रंग रूप का सौदाई

जिनके सर हो इश्क़ की छाँव
पाँव के नीचे जन्नत होगी
शाम रात, मेरी कायनात
वो यार मेरा सैय्याँ सैय्याँ
चल छैय्याँ छैय्याँ…

Tuesday, January 23, 2018

तेरे इश्क नचाइआ / बाबा बुल्ले शाह


बहुड़ीं वे तबीबा मैंडी जिन्द गईआ ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

इश्क डेरा मेरे अन्दर कीता,
भर के ज़हर प्याला मैं पीता,
झबदे आवीं वे तबीबा नहीं ते मैं मर गईआं ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

छुप्प गया सूरज बाहर रह गई आ लाली,
होवां मैं सदके मुड़ जे दें विखाली ,
मैं भुल्ल गईआं तेरे नाल ना गईआं ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

तेरे इश्क दी सार वे मैं ना जाणां,
इह सिर आया ए मेरा हेठ वदाणां,
सट्ट पई इश्के दी तां कूकां दईआं ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

एस इश्क दे कोलों सानूं हटक ना माए,
लाहू (लाहौर) जांदड़े बेड़े मोड़ कौन हटाए,
मेरी अकल भुल्ली नाल मुहाण्यां दे गईआं ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

एस इश्क दी झंगी विच मोर बुलेंदा,
सानूं काबा ते किबला प्यारा यार दसेंदा,
सानूं घायल करके फिर खबर ना लईआ ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

बुल्ल्हा शाह इनायत दे बह बूहे,
जिस पहनाए सानूं सावे सूहे,
जां मैं मारी उडारी मिल प्या वहिया ।
तेरे इश्क नचाइआ कर थईआ थईआ ।

Note: If you're finding some problem in following the poem in Punjabi, then here is an English translation by  Kartar Singh Duggal  on his blog.

Monday, January 22, 2018

वीरों का कैसा हो वसंत / सुभद्राकुमारी चौहान

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत

गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

Sunday, January 21, 2018

Fire and Ice / Robert Frost

Some say the world will end in fire, 
Some say in ice. 
From what I’ve tasted of desire 
I hold with those who favor fire. 
But if it had to perish twice, 
I think I know enough of hate 
To say that for destruction ice 
Is also great 
And would suffice.

#This is one of my favourite poems. The art of piercing deep with how few a words. Amazing!

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...