Tuesday, April 27, 2021
कंठ जल रहा है / दीनानाथ सुमित्र
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है
सुना नहीं पंछी का गाना
रात अँधेरी बनी ठिकाना
सुख का जाना दुख का आना
रोज चल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है
प्यार बिक रहा, यार बिक रहा
दवा संग बीमार बिक रहा
निष्ठुर है आभार बिक रहा
नहीं खल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है
लुप्त हो गई है चेतनता
कहाँ खो गई नम्र-नम्रता
मरी-मरी-सी है सज्जनता
जीत छल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है
मार्ग कठिन है लक्ष्य न दिखता
टिकने वाला वक्ष न दिखता
ताज न दिखता तख्त न दिखता
सत्य गल रहा है
गीत मगन मन कैसे गाऊँ
कंठ जल रहा है
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