दुनिया के इस द्यूत क्रीड़ा- गृह में
मामा शकुनि के चतुर- पास में
परम-पूज्य पितामह हैं मौजूद
सिंहासन पर बैठी गांधारी सी
सासें भी हैं, जो स्वयं बाँध रक्खी हैं
आँखों पर अंधेपन की पट्टी
धृतराष्ट्र सा मधुर वचन बोलने वाला
ससुर भी है नेत्रहीन, गंभीर, बधिर
तुम्हारा प्यारा देवर, दुःशासन भी है
जो आँखों की पुतलियों में छुपाये हुए है
तुम्हारे चीर-हरण का भावी तसवीर
सत्यवादी युधिष्ठिर सा पति भी है
तुमको दाव पर लगाने को है आतुर
श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन भी है, जो
ला देगा तुमको सुभद्रा सी सौतन
किस बात की कमी रह गई है
इस द्यूत क्रीड़ा-गृह में पांचाली
जो तुम अभी तक नहीं आई
विदुर सा नीतिशास्त्र का ज्ञाता
काकाश्री इस दुनिया में अब नहीं रहे
उनसे तुम्हारा परिचय करबाऊँ कैसे
हाँ, दुःशासन सा देवर तुम्हारा
चीर- हरण को यहीं है बैठा
कुरूवंश के रखवाले द्रोणाचार्य
और पितामह भी यहीं हैं
सभी शांत, आतुर पलकें बिछाए
अपने आसन पर बैठे हुए हैं
सिर्फ तुम्हारा चीर- हरण होना है बाकी
अब न कोई व्यास, महाभारत रचेगा
न ही कृष्ण किसी को बहन बनायेगा
अब द्रौपदी कम , सीता यहाँ ज्यादा आयेगी
क्योंकि हर सीता को वन में जाना है
और अग्निकुंड में कूदकर पातिव्रत का
सबूत देकर भी, धरती में समा जाना है
पर अब दुर्योधन के शासन-काल में
द्रौपदी का आना नितांत आवश्यक है
जो अपने पति से कह सके
अपनों की छाती का लहू ला दो
मुझे शोणित-स्नान करना है
पर अफसोस तो यह है कि
द्रौपदी को भीम सा पति मिलना मुश्किल है
द्रौपदी जब तक द्यूत क्रीड़ा-गृह में
चीर-हरण करबाने नहीं आयगी
तब तक दुर्योधन, दुःशासन और शकुनि
ऐसे ही द्यूतशाला को सजाते रहेंगे
द्रौपदी के हमशक्ल का चीरहरण होता रहेगा
क्योंकि कृष्ण तुमको छोड़कर और
किसी को बहन नहीं मानते, वरना एक बार
फिर से नारी- रक्षा को यहाँ नहीं आते
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