Saturday, January 20, 2018

डरते हैं ईश्वर भी / प्रतिभा शतपथी

तलाशती फिर रही है राह 
चौराहे पर 
इतने बड़े महादेश के दक्षिण में 

शोर-शराबे से भरा मणियों का बाज़ार 
पृथ्वी को बेच-बाच कर खा जाने को तैयार लोग 
चले जा रहे हैं राह बदल 
आ-जा रहे हैं 
दिन भर में लाखों सौदागर 
वहीं एक औरत परेशान है 
कहाँ है उसका घर 
राह ढूँढती
कुछ ही हाथ की दूरी पर 
समुद्र में टूटती निलिमा
प्रबल-लताओं से धड़कता है जीवन 
संसार के सुख-दुख झेलकर 
लौट जाएगी वह औरत, कहती है 
कहीं तो होगा उसका एक घर 
है सत्य की कसौटी 
उसमें अपनी साँसों को उसने 
छिन-छिन परखा है 

पगली है या कोई वेश्या
या सिद्ध देवी
न जाने कौन है वह औरत 
उसे राह बताने में 
खड़े होने में उसके पास 
डरते हैं ईश्वर भी ।

Note: This is an Odia poem translated to Hindi by Rajendra Prasad Mishra.

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