Come gather 'round, people
Wherever you roam
And admit that the waters
Around you have grown
And accept it that soon
You'll be drenched to the bone
If your time to you is worth savin'
And you better start swimmin'
Or you'll sink like a stone
For the times they are a-changin'
Come writers and critics
Who prophesize with your pen
And keep your eyes wide
The chance won't come again
And don't speak too soon
For the wheel's still in spin
And there's no tellin' who
That it's namin'
For the loser now
Will be later to win
For the times they are a-changin'
Come senators, congressmen
Please heed the call
Don't stand in the doorway
Don't block up the hall
For he that gets hurt
Will be he who has stalled
The battle outside ragin'
Will soon shake your windows
And rattle your walls
For the times they are a-changin'
Come mothers and fathers
Throughout the land
And don't criticize
What you can't understand
Your sons and your daughters
Are beyond your command
Your old road is rapidly agin'
Please get out of the new one
If you can't lend your hand
For the times they are a-changin'
The line it is drawn
The curse it is cast
The slow one now
Will later be fast
As the present now
Will later be past
The order is rapidly fadin'
And the first one now
Will later be last
For the times they are a-changin'
Thursday, October 31, 2019
Wednesday, October 30, 2019
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर / साहिर लुधियानवी
ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवाँ ज़िन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार
ये ग़ुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी-हारी साँसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरों में खाँसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवाँ भी
तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियाँ भी
ये बीवी भी है और बहन भी है, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
मदद चाहती है ये हौवा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये लुटते हुए कारवाँ ज़िन्दगी के
कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफ़िज़ ख़ुदी के
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये पुरपेच गलियाँ, ये बदनाम बाज़ार
ये ग़ुमनाम राही, ये सिक्कों की झन्कार
ये इस्मत के सौदे, ये सौदों पे तकरार
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये सदियों से बेख्वाब, सहमी सी गलियाँ
ये मसली हुई अधखिली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
वो उजले दरीचों में पायल की छन-छन
थकी-हारी साँसों पे तबले की धन-धन
ये बेरूह कमरों में खाँसी की ठन-ठन
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ये फूलों के गजरे, ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें, ये गुस्ताख फ़िकरे
ये ढलके बदन और ये बीमार चेहरे
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
यहाँ पीर भी आ चुके हैं, जवाँ भी
तनोमंद बेटे भी, अब्बा, मियाँ भी
ये बीवी भी है और बहन भी है, माँ भी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
मदद चाहती है ये हौवा की बेटी
यशोदा की हमजिंस, राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत, ज़ुलयखां की बेटी
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
ज़रा मुल्क के रहबरों को बुलाओ
ये कुचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर उनको लाओ
जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं
Tuesday, October 29, 2019
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा / शिव कुमार बटालवी
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा,
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
दिल दा डर सी किते ना लै बैठे,
लै ही बैठा जनाब लै बैठा।
वेहल जद वी मिली है फ़रज़ां तों,
तेरे मुक्ख दी किताब लै बैठा।
किन्नी पीती ते, किन्नी बाकी है,
मैंनू एहो हिसाब ले बैठा।
मैंनू जद वी तूसी तो याद आये,
दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।
चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।
शिव नूं इक गम ते ही भरोसा सी,
गम तों कोरा जवाब लै बैठा।
रंग गोरा गुलाब लै बैठा।
दिल दा डर सी किते ना लै बैठे,
लै ही बैठा जनाब लै बैठा।
वेहल जद वी मिली है फ़रज़ां तों,
तेरे मुक्ख दी किताब लै बैठा।
किन्नी पीती ते, किन्नी बाकी है,
मैंनू एहो हिसाब ले बैठा।
मैंनू जद वी तूसी तो याद आये,
दिन दिहाड़े शराब ले बैठा।
चन्गा हुन्दा सवाल ना करदा,
मैंनू तेरा जवाब ले बैठा।
शिव नूं इक गम ते ही भरोसा सी,
गम तों कोरा जवाब लै बैठा।
Monday, October 28, 2019
The Smile / William Blake
There is a Smile of Love
And there is a Smile of Deceit
And there is a Smile of Smiles
In which these two Smiles meet
And there is a Frown of Hate
And there is a Frown of disdain
And there is a Frown of Frowns
Which you strive to forget in vain
For it sticks in the Hearts deep Core
And it sticks in the deep Back bone
And no Smile that ever was smild
But only one Smile alone
That betwixt the Cradle & Grave
It only once Smild can be
But when it once is Smild
Theres an end to all Misery
And there is a Smile of Deceit
And there is a Smile of Smiles
In which these two Smiles meet
And there is a Frown of Hate
And there is a Frown of disdain
And there is a Frown of Frowns
Which you strive to forget in vain
For it sticks in the Hearts deep Core
And it sticks in the deep Back bone
And no Smile that ever was smild
But only one Smile alone
That betwixt the Cradle & Grave
It only once Smild can be
But when it once is Smild
Theres an end to all Misery
Sunday, October 27, 2019
दीपावली / रामेश्वर शुक्ल 'अंचल'
दिशा-दिशा में दीपों की
आलोक-ध्वजा फहराओ
देह-प्रहित शुभ शुक्र! आज तुम
घर-घर में उग आओ
व्योम-भाल पर अंकित कर दो
ज्योति-हर्षिणी क्रीड़ा
सप्तवर्ण सौंदर्य!
प्रभामंडल में प्राण जगाओ!
जागो! जागो! किरणों के
ईशान! क्षितिज-बाहों में
जागो द्योनायक! पर्जन्यों की
अरश्मि राहों में
जागो स्वप्नगर्भ तमसा के
उर्ध्व शिखर अवदाती
श्री के संवत्सर जागो
द्युति की चक्रित चाहों में।
तिमिर-पंथ जीवन की
जल-जल उठे वर्तिका काली
पके समूची सृष्टि विभा से,
अमा घनी भौंराली
सुषमा के अध्वर्य,
उदित शोभा के मंत्रजयी ओ!
भर दो ऊर्जा से प्रदीप्ति की
भुवन-मंडिनी थाली।
गोरज-चिह्नित अंतरिक्ष के
ज्योति-कलश उमड़ाओ
स्वर्णपर्ण नभ से फिर मिट्टी
के दीपों में आओ
आभा के अधिदेव! मिटा दो
धरा-गगन की रेखा
रश्मित निखिल यज्ञफल को फिर
जन-जन सुलभ बनाओ
दिशा-दिशा में इंद्रक्रांति के
कुमुद-पात्र बिखराओ
सप्तसिंधु-पोषित धरणी की
अंजलि भरते जाओ
सुरजन्मी आलोक! चतुर्दिक
प्रतिकल्पी तम छाया
श्री के संवत्सर! ऋतुओं की
जड़ता पर छा जाओ!
आलोक-ध्वजा फहराओ
देह-प्रहित शुभ शुक्र! आज तुम
घर-घर में उग आओ
व्योम-भाल पर अंकित कर दो
ज्योति-हर्षिणी क्रीड़ा
सप्तवर्ण सौंदर्य!
प्रभामंडल में प्राण जगाओ!
जागो! जागो! किरणों के
ईशान! क्षितिज-बाहों में
जागो द्योनायक! पर्जन्यों की
अरश्मि राहों में
जागो स्वप्नगर्भ तमसा के
उर्ध्व शिखर अवदाती
श्री के संवत्सर जागो
द्युति की चक्रित चाहों में।
तिमिर-पंथ जीवन की
जल-जल उठे वर्तिका काली
पके समूची सृष्टि विभा से,
अमा घनी भौंराली
सुषमा के अध्वर्य,
उदित शोभा के मंत्रजयी ओ!
भर दो ऊर्जा से प्रदीप्ति की
भुवन-मंडिनी थाली।
गोरज-चिह्नित अंतरिक्ष के
ज्योति-कलश उमड़ाओ
स्वर्णपर्ण नभ से फिर मिट्टी
के दीपों में आओ
आभा के अधिदेव! मिटा दो
धरा-गगन की रेखा
रश्मित निखिल यज्ञफल को फिर
जन-जन सुलभ बनाओ
दिशा-दिशा में इंद्रक्रांति के
कुमुद-पात्र बिखराओ
सप्तसिंधु-पोषित धरणी की
अंजलि भरते जाओ
सुरजन्मी आलोक! चतुर्दिक
प्रतिकल्पी तम छाया
श्री के संवत्सर! ऋतुओं की
जड़ता पर छा जाओ!
Saturday, October 26, 2019
नववधू का गृहप्रवेश / कविता पनिया
एक दिवस नववधू का गृहप्रवेश देख,
कुछ प्रश्न मन में उठे
कैसे यह पौधा अपनी ज़मीन से,
उखड़कर सजधज कर खड़ा है
क्या यह पुनः रोपित होगा
सिंचित हो फलेगा-फैलेगा,
या शोषित हो मुरझाएगा
क्या यह अपनी जड़ें जमा पाएगा
क्या इस पर मृदुल स्पर्श का जल,
छिड़का जाएगा या तपिश में
यह जल जाएगा
लोग कहते हैं नया जनम
इसने पाया है
मुझे तो ये गुलाब का पौधा नज़र आया है
जिसे कहीं भी रोपा जाए
अपनी जड़ें जमा लेता है
उम्मीद है
यह भी गुलाब का पौधा साबित हो
काँटों के बीच रह कर भी
खिले मुसकुराए
अपनी खुशबू से घर आंगन महकाए,
अपने अस्तित्व के साथ
नववधू घर आए
कुछ प्रश्न मन में उठे
कैसे यह पौधा अपनी ज़मीन से,
उखड़कर सजधज कर खड़ा है
क्या यह पुनः रोपित होगा
सिंचित हो फलेगा-फैलेगा,
या शोषित हो मुरझाएगा
क्या यह अपनी जड़ें जमा पाएगा
क्या इस पर मृदुल स्पर्श का जल,
छिड़का जाएगा या तपिश में
यह जल जाएगा
लोग कहते हैं नया जनम
इसने पाया है
मुझे तो ये गुलाब का पौधा नज़र आया है
जिसे कहीं भी रोपा जाए
अपनी जड़ें जमा लेता है
उम्मीद है
यह भी गुलाब का पौधा साबित हो
काँटों के बीच रह कर भी
खिले मुसकुराए
अपनी खुशबू से घर आंगन महकाए,
अपने अस्तित्व के साथ
नववधू घर आए
Friday, October 25, 2019
Deep Mists of Longing / Christopher John Brennan
Deep mists of longing blur the land
as in your late October eve:
almost I think your hand might leave
its old caress upon my hand —
for sure this floating world of dream
hath touch'd that far reality
of memory's heaven; nor would I deem
the chance a strange one, if to thee
my feet should stray ere fall the night,
or, reaching to that lucent shore,
these eyes should wake on tenderer light
to greet the spring and thee once more.
as in your late October eve:
almost I think your hand might leave
its old caress upon my hand —
for sure this floating world of dream
hath touch'd that far reality
of memory's heaven; nor would I deem
the chance a strange one, if to thee
my feet should stray ere fall the night,
or, reaching to that lucent shore,
these eyes should wake on tenderer light
to greet the spring and thee once more.
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