Saturday, April 10, 2021

रखता है आसतीं में जो ख़ंजर लपेटकर / नकुल गौतम

करता है बात अम्न की अक्सर लपेटकर
रखता है आसतीं में जो ख़ंजर लपेटकर

हर रोज़ घूमता है कड़ी धूप में फ़क़ीर
तावीज़ बेचता है मुक़द्दर लपेटकर

उसने ग़ज़ल कही कि निचोड़ा है दिल कोई
कागज़ में रख दिया है समन्दर लपेटकर

जो अश्क पोंछने को दिया था उसे रुमाल
रखता है अब फ़रेब का पत्थर लपेटकर

ओढ़ी रजाई बर्फ़ की बूढ़े पहाड़ ने
रक्खी है जब से धूप की चद्दर लपेट कर

शायद क़लम में फिट है कहीं कैमरा कोई
ऐसे उतारता है वो मन्ज़र लपेट कर

बादल गुज़र रहे हैं दबे पैर गाँव से
माँ ने रखे हैं धूप में बिस्तर लपेटकर

इस डायरी को बन्द ही रहने दो अब 'नकुल'
है थक के सोई बाँह क़लम पर लपेटकर

Wednesday, April 7, 2021

खण्डहर और बूढ़ा आदमी / उत्तिमा केशरी

मेरे घर के सामने
उस खण्डहरनुमा मकान में
न जाने कब से
वह बूढ़ा आदमी काट रहा है
अपना बचा-खुचा जीवन !

वह खण्डहर
पुराने मन्दिर की तरह
सुनसान है,
सूखे तालाब की तरह
उदास है।
निस्सिम रात्रि में
कुत्ते की भौंकने की तरह
मनहूस दीखता है।

कहती है दादी —
उनके दोनों बेटे
परदेश में जा बसे हैं,
बेटी, अपनी ससुराल में ।

बूढ़ी के अनन्त यात्रा पर
जाने के बाद बूढ़ा
हो गया है
बिलकुल अकेला।

वह प्राणी, अब हो गया है
संदर्भहीन भी।
अपनी पकी दाढ़ी, मूछों
और
जटिल केश-राशि से आच्छादित
जब चलता है-तीन टाँगों पर,
तब, उसकी झुकी गर्दन,
बना डालती है समकोण
उसकी देह यष्टि पर।

तब मैं फ़र्क नहीं कर पाती
खण्डहर और उनमें ।
एक बिना सांस का
एक दूसरा सांस लेते हुए जीता है।

Tuesday, April 6, 2021

चलो ज़िन्दगी को मुहब्बत बना दें / हरकीरत हीर

चलो ज़िन्दगी को मुहब्बत बना दें
जहां से ज़ुलम औ' सितम हम मिटा दें

अहम की दिवारें नहीं मीत अच्छी
बनाई हमीं ने हमीं अब गिरा दें

दिलों में अदावत जो पाली है हम ने
गले मिल चलो अब उसे हम भुला दें

न हिन्दू , मुस्लिम, न सिख, ना इसाई
नया धर्म अपना मुहब्बत चला दें

अमीरी गरीबी में दुनियां बँटी है
ये कैसी लकीरें इन्हें हम मिटा दें

जहाँ खिल न पाये कभी फूल कोई
बहारों को अब उस चमन का पता दें

चलें डाल कर हम तो' बाहों में' बाहें
सभी खार नफ़रत के' चुन-चुन हटा दें

खुले नफरतों के ठिकाने जहाँ पर
वहाँ न्याय की बस्तियाँ हम बना दें

मुहब्बत ख़ुदा की नियामत अगर है
शमा प्रेम की 'हीर' दिल में जला दें

Monday, April 5, 2021

I Shall Be Lived As Quiet Things / Karle Wilson Baker

I shall be loved as quiet things
Are loved--white pigeons in the sun,
Curled yellow leaves that whisper down
One after one;

The silver reticence of smoke
That tells no secret of its birth
Among the fiery agonies
That turn the earth;

Cloud-islands; reaching arms of trees;
The frayed and eager little moon
That strays unheeded through a high
Blue afternoon.

The thunder of my heart must go
Under the muffling of the dust--
As my gray dress has guarded it
The grasses must;

For it has hammered loud enough,
Clamored enough, when all is said:
Only its quiet part shall live
When I am dead.

Sunday, April 4, 2021

अजनबी देश है यह / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है
कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है

जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई,
नींद में जैसे कोई लौट-लौट जाता है

होश अपने का भी रहता नहीं मुझे जिस वक्त
द्वार मेरा कोई उस वक्त खटखटाता है

शोर उठता है कहीं दूर क़ाफिलों का-सा
कोई सहमी हुई आवाज़ में बुलाता है

देखिए तो वही बहकी हुई हवाएँ हैं,
फिर वही रात है, फिर-फिर वही सन्नाटा है

हम कहीं और चले जाते हैं अपनी धुन में
रास्ता है कि कहीं और चला जाता है

दिल को नासेह की ज़रूरत है न चारागर की
आप ही रोता है औ आप ही समझाता है ।

Saturday, April 3, 2021

दिलबरो / गुलज़ार

उंगली पकड़ के तूने
चलना सिखाया था ना
दहलीज़ ऊँची है ये
पार करा दे

बाबा मैं तेरी मलिका
टुकड़ा हूँ तेरे दिल का
इक बार फिर से दहलीज़ पार करा दे

मुड़ के ना देखो दिलबरो, दिलबरो
मुड़ के ना देखो दिलबरो

फसलें जो काटी जायें,
उगती नहीं हैं
बेटियाँ जो ब्याही जाएँ,
मुड़ती नहीं हैं
ऐसी बिदाई हो तो,
लंबी जुदाई हो तो
दहलीज़ दर्द की भी पार करा दे
बाबा मैं तेरी मलिका...

मेरे दिलबरो
बर्फें गलेंगी फिर से
मेरे दिलबरो
फसलें पकेंगी फिर से
तेरे पाँव के तले
मेरी दुआ चले
दुआ मेरी चले

Thursday, April 1, 2021

हुई हवायें गर जहरीली / चन्द्रगत भारती

अगर संतुलन धरा का बिगड़ा,
जिन्दा न रह पाओगे।
हुई हवायें गर जहरीली
घुट घुट कर मर जाओगे।।

बेकार ना जाये बूंद कोई
जल की बरबादी रोको!
जनसंख्या विस्फोट हो रहा,
बढ़ती आबादी रोको!
भूखे प्यासे रहेंगे बच्चे,
फिर कुछ ना कर पाओगे।।

सदा रखो ओजोन सुरक्षित,
परा बैगनी किरने रोको!
हरे पेड़ ना कटने पायें
मिलकर सभी जने रोको!
अगर समन्दर लगेगा जलने,
कैसे भला बुझाओगे ?

हरियाली धरती पर लाओ,
पर्यावरण न हो दूषित
धरती माँ से प्यार करो तुम
मानवता कर दो पोषित!
कहर प्रकृति ने अगर ढा दिया,
मिट्टी मे मिल जाओगे।।

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...