Saturday, December 7, 2019

सर्प क्यूं इतने चकित हो / प्रसून जोशी

सर्प क्यूं इतने चकित हो
दंश का अभ्यस्त हूं
पी रहा हूं विष युगों से
सत्य हूं आश्वस्त हूं

सर्प क्यूं इतने चकित हो...

ये मेरी माटी लिए है
गंध मेरे रक्त की
जो कहानी कह रही है
मौन की, अभिव्यक्त की
मैं अभय लेकर चलूंगा
मैं व्यथित ना त्रस्त हूं

सर्प क्यूं इतने चकित हो...

है मेरा उद्गम कहां पर
और कहां गंतव्य है
दिख रहा है सत्य मुझको
रूप जिसका भव्य है
मैं स्वयं की खोज में
कितने युगों से व्यस्त हूं

सर्प क्यूं इतने चकित हो...

मुझे संज्ञान इसका
बुलबुला हूं सृष्टि में
एक लघु सी बूंद हूं मैं
एक शाश्वत वृष्टि में
है नहीं सागर को पाना
मैं नदी संन्यस्त हूं

सर्प क्यूं इतने चकित हो...

Friday, December 6, 2019

Borrowed Time / John Sensele

Puny pride parades pomposity
Pounding its cherished chest in a quest
To increase celerity and luminosity
Thereby eating its substance and balance into a pesky pest.

Puny pride provokes the power
It possesses not
Screaming in a shower, offering a frail flower
No woman wants when the ambiance blows hot.

Puny pride cultures and nurtures nonsense
Clawing its way into arrogance
Denuded of the essence of common sense
The absence of which denies pride the fortifying fragrance

Puny pride needs to survive
In spaces puny pride rents
If proponents of proven performance derive
Value from the prize paucity puny pride vents.

Puny pride ought to watch its back
Lest it should be cast out
To rot in ignominy when its hack
Undressing the foot in the boastful boot teeming with a double doubt

Verbal diarrhea engenders
When puny pride falls from grace
Enlisting in the club of dribbled defenders
Who in the end can't survive a redoubtable rat race.

Thursday, December 5, 2019

Progress Report / Vikram Seth

My need has frayed with time; you said it would.
It has; I can walk again across the flood
Of gold sil popples on the straw-gold hills
Under a deep Californian sky that expels
All truant clouds; watch squads of cattle graze
By the radio-telescope; blue-battered jays
Flash raucous squaking by my swivelling head
While squirrels sine-wave past over the dead
Oak-leaves, and not miss you_although I may
Admit that near the telescope yesterday
By a small bushcovered gully I blundered on
Five golden fox-cubs playing in the sun
And wished you had been there to see them play;
But that I only mention by the way.

Wednesday, December 4, 2019

खुले नहीं दरवाज़े / नचिकेता

खुले नहीं दरवाज़े
बाहर कब तक
शांत रहूँ

घर के अंदर
तनिक नहीं हलचल है
आहट है
धड़कन है
साँसें हैं
साँसों की गरमाहट है
होठों की ख़ामोशी का क्यों
तीख़ा दंश सहूँ


घर के बाहर धूल
धुआँ, बदबू, सन्नाटा है
कसक रहा तलवे में चुभकर
टूटा काँटा है
किस ज़बान से
इन दुर्घटनाओं की व्यथा
कहूँ

नीम-निबौरी झरी
गीत कोयल का मौन हुआ
क्रुद्ध ततैये जैसा डंक
मारती है पछुआ
ज़हरीली है नदी
धार में
कितना दूर बहूँ

Tuesday, December 3, 2019

When You Are Old / William Butler Yeats

When you are old and grey and full of sleep,
And nodding by the fire, take down this book,
And slowly read, and dream of the soft look
Your eyes had once, and of their shadows deep;
How many loved your moments of glad grace,
And loved your beauty with love false or true,
But one man loved the pilgrim Soul in you,
And loved the sorrows of your changing face;
And bending down beside the glowing bars,
Murmur, a little sadly, how Love fled
And paced upon the mountains overhead
And hid his face amid a crowd of stars.

Monday, December 2, 2019

आख़िरी सफ़र पर निकलने तक / पंकज पराशर

पढ़ने के लिए गाँव छोड़ते समय सोचा था
पढ़ाई पूरी करने के बाद गाँव लौट जाऊँगा
मगर नौकरी लगी और गाँव लौटना मुल्तवी हो गया
नौकरी लगती रही छूटती रही और हर बार नई नौकरी की चिंता में
गाँव लौटने की बात मुल्तवी दर मुल्तवी होती रही
कई शहरों में भटकते-भटकते
नौकरी बचाए रखने की हुनर से अनजान
भटकता रहता हूँ नींद में भी गाँव की स्मृतियों में
जहाँ लौटना मुल्तवी ही होता रहा है आज तक
पिता ने कितने अरमान के साथ पढ़ा-लिखाया
कमाने-धमाने के लायक बनाया
और लायक बनकर उनके सुख-दुख से दूर
न कंधा बन सका न बुढा़पे की लाठी
जो अक्सर बेटे के जन्म पर सुनता था गाँव में
बॉस को खुश रखने और नौकरी बचाए रखने के तनावों के बीच
मुल्तवी होती रहती हैं मनपसंद किताबें
मनपसंद काम और शहर की सड़कों पर घंटों आवारगी की इच्छा
किसी के काम आने की आदर्श इच्छा आत्मकेंद्रिकता में बदलती रही
और कभी दूसरों की चिंता में भी डूबने की आदत छूटती चली गई
क्या यही चाहा था हमने जे०एन०यू० में पढ़ते हुए?
हर बार ब्यूरोक्रेट बनने के इम्तहान का फार्म भरने से इनकार करते हुए?

न पिता खुश हैं न माँ खुश है
और बॉस की नाराज़गी तो उनका स्थाई भाव बन गया है
जबकि अपनी खुशी की तलाश तक के लिए वक़्त नहीं मिला कभी मुझे?
मुल्तवी करते-करते एक दिन सब कुछ मुल्तवी होता चला जाएगा
और शायद कहीं लौटना संभव न हो
गहरे अफसोस के साथ आखिरी सफर पर निकलने तक।

Sunday, December 1, 2019

नदी / नंदा पाण्डेय

बड़ी सहजता से
एक अटूट विश्वास
के साथ
सारे बंधन को उतार कर
सौंप कर अपना
सब कुछ...

अपनी नियति
अपना द्वंद
अपनी आशा
अपनी निराशा
अपनी व्यथा
अपना मान
अपना अभिमान
अपना भविष्य और अपना वर्तमान

भागते हुए
आ लिपटती थी
जैसे वर्षों के बिछड़े
अपनी सुध-बुध भूल
एक दूसरे में समा जाने को
हो गए हों आतुर
उनके इस आंतरिक और हार्दिक
मिलन पर तो जैसे
प्रकृति भी मुग्ध
हो जाती थी
उसके सुगंध से
मिलता था उसको
एक पार्थिव आनंद
होता था अहसास
खुद के जिंदा होने का

कहीं दूर बह जाने से
कुछ नया जरूर मिलता
पर जीवन का अर्थ और
भीतरी तलाश की तुष्टि
जहां निर्वाक होकर
जीना चाहती थी
अपनी उदासी के
हर क्षण को
शायद यह किनारा ही था...

वैसे मिट्टी की खुशबू आज भी पसंद है उसको!

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...