Sunday, April 7, 2019

Better Not Ask Me / Shel Silverstein

(Hey the truth might hurt so I'm tellin' you now that you better not ask me)
Hey you better not ask me where I been all night
Why my eyes are shinin' and my spirit is flyin'
You better not ask if I been doin' right or I just might tell you
And you better not ask me bout the girls I used to know
And days I used to run around before I ever met you
You better not ask how they compare to you or I just might tell you
And you better not ask me if I'm satisfied
With the way you've been givin' me what you call lovin'
Better not ask me bout the times I cried or I just might tell you
So keep on doin' what you're doin' and if you should see me straight
Well don't you ask baby just let it pass baby
And maybe it'll go away but I don't doubt it
You better not ask me if I'm gonna stick around
Or pack up all my bags and find another pretty city
You better not ask me who it is I found or I just might tell you

Saturday, April 6, 2019

संध्या सुन्दरी / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

दिवसावसान का समय-
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या-सुन्दरी, परी सी,
धीरे, धीरे, धीरे
तिमिरांचल में चंचलता का नहीं कहीं आभास,
मधुर-मधुर हैं दोनों उसके अधर,
किंतु ज़रा गंभीर, नहीं है उसमें हास-विलास।
हँसता है तो केवल तारा एक-
गुँथा हुआ उन घुँघराले काले-काले बालों से,
हृदय राज्य की रानी का वह करता है अभिषेक।
अलसता की-सी लता,
किंतु कोमलता की वह कली,
सखी-नीरवता के कंधे पर डाले बाँह,
छाँह सी अम्बर-पथ से चली।
नहीं बजती उसके हाथ में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन-झुन रुन-झुन नहीं,
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप चुप चुप'
है गूँज रहा सब कहीं-

व्योम मंडल में, जगतीतल में-
सोती शान्त सरोवर पर उस अमल कमलिनी-दल में-
सौंदर्य-गर्विता-सरिता के अति विस्तृत वक्षस्थल में-
धीर-वीर गम्भीर शिखर पर हिमगिरि-अटल-अचल में-
उत्ताल तरंगाघात-प्रलय घनगर्जन-जलधि-प्रबल में-
क्षिति में जल में नभ में अनिल-अनल में-
सिर्फ़ एक अव्यक्त शब्द-सा 'चुप चुप चुप'
है गूँज रहा सब कहीं-

और क्या है? कुछ नहीं।
मदिरा की वह नदी बहाती आती,
थके हुए जीवों को वह सस्नेह,
प्याला एक पिलाती।
सुलाती उन्हें अंक पर अपने,
दिखलाती फिर विस्मृति के वह अगणित मीठे सपने।
अर्द्धरात्री की निश्चलता में हो जाती जब लीन,
कवि का बढ़ जाता अनुराग,
विरहाकुल कमनीय कंठ से,
आप निकल पड़ता तब एक विहाग!

Friday, April 5, 2019

तुम कनक किरन / जयशंकर प्रसाद

तुम कनक किरन के अंतराल में
लुक छिप कर चलते हो क्यों ?

नत मस्तक गवर् वहन करते
यौवन के घन रस कन झरते
हे लाज भरे सौंदर्य बता दो
मोन बने रहते हो क्यो?

अधरों के मधुर कगारों में
कल कल ध्वनि की गुंजारों में
मधु सरिता सी यह हंसी तरल
अपनी पीते रहते हो क्यों?

बेला विभ्रम की बीत चली
रजनीगंधा की कली खिली
अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल
कलित हो यों छिपते हो क्यों?

Thursday, April 4, 2019

Minority Poem / Nissim Ezekiel

In my room, I talk
to my invisible guests:
they do not argue, but wait

Till I am exhausted,
then they slip away
with inscrutable faces.

I lack the means to change
their amiable ways,
although I love their gods.

It's the language really
separates, whatever else
is shared. On the other hand,

Everyone understands
Mother Theresa; her guests
die visibly in her arms.

It's not the mythology
or the marriage customs
that you need to know,

It's the will to pass
through the eye of a needle
to self-forgetfulness.

The guests depart, dissatisfied;
they will never give up
their mantras, old or new.

And you, uneasy
orphan of their racial
memories, merely

Polish up your alien
techniques of observation,
while the city burns.

Wednesday, April 3, 2019

सिर्फ़ इतने जुर्म पर हंगामा होता जाए है / कैफ़ भोपाली

सिर्फ़ इतने जुर्म पर हंगामा होता जाए है
तेरा दीवाना तिरी गलियों में देखा जाए है

आप किस किस को भला सूली चढ़ाते जाएँगे
अब तो सारा शहर ही मंसूर बनता जाए है

दिलबरों के भेस में फिरते हैं चोरों के गिरोह
जागते रहियो कि इन रातों में लूटा जाए है

तेरा मय-ख़ाना है या ख़ैरात-ख़ाना साक़िया
इस तरह मिलता है बादा जैसे बख़्शा जाए है

मय-कशो आगे बढ़ो तिश्ना-लबो आगे बढ़ो
अपना हक़ माँगा नहीं जाता है छीना जाए है

मौत आई और तसव्वुर आप का रुख़्सत हुआ
जैसे मंज़िल तक कोई रह-रौ को पहुँचा जाए है

Tuesday, April 2, 2019

In the Well / Andrew Hudgins

My father cinched the rope,
a noose around my waist,
and lowered me into
the darkness. I could taste

my fear. It tasted first
of dark, then earth, then rot.
I swung and struck my head
and at that moment got

another then: then blood,
which spiked my mouth with iron.
Hand over hand, my father
dropped me from then to then:

then water. Then wet fur,
which I hugged to my chest.
I shouted. Daddy hauled
the wet rope. I gagged, and pressed

my neighbor's missing dog
against me. I held its death
and rose up to my father.
Then light. Then hands. Then breath.

Monday, April 1, 2019

फसल / केदारनाथ सिंह

मैं उसे बरसों से जानता था--
एक अधेड़ किसान
थोड़ा थका
थोड़ा झुका हुआ
किसी बोझ से नहीं
सिर्फ़ धरती के उस सहज गुरुत्वाकर्षं से
जिसे वह इतना प्यार करता था
वह मानता था--
दुनिया में कुत्ते बिल्लियाँ सूअर
सबकी जगह है
इसलिए नफ़रत नहीं करता था वह
कीचड़ काई या मल से

भेड़ें उसे अच्छी लगती थीं
ऊन ज़रूरी है--वह मानता था
पर कहता था--उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है
उनके थनों की गरमाहट
जिससे खेतों में ढेले
ज़िन्दा हो जाते हैं

उसकी एक छोटी-सी दुनिया थी
छोटे-छोटे सपनों
और ठीकरों से भरी हुई
उस दुनिया में पुरखे भी रहते थे
और वे भी जो अभी पैदा नहीं हुए
महुआ उसका मित्र था
आम उसका देवता
बाँस-बबूल थे स्वजन-परिजन
और हाँ, एक छोटी-सी सूखी
नदी भी थी उस दुनिया में-
जिसे देखकर-- कभी-कभी उसका मन होता था
उसे उठाकर रख ले कंधे पर
और ले जाए गंगा तक--
ताकि दोनों को फिर से जोड़ दे
पर गंगा के बारे में सोचकर
हो जाता था निहत्था!

इधर पिछले कुछ सालों से
जब गोल-गोल आलू
मिट्टी फ़ोड़कर झाँकने लगते थे जड़ों से
या फसल पककर
हो जाती थी तैयार
तो न जाने क्यों वह-- हो जाता था चुप
कई-कई दिनों तक
बस यहीं पहुँचकर अटक जाती थी उसकी गाड़ी
सूर्योदय और सूर्यास्त के
विशाल पहियोंवाली

पर कहते हैं--
उस दिन इतवार था
और उस दिन वह ख़ुश था
एक पड़ोसी के पास गया
और पूछ आया आलू का भाव-ताव
पत्नी से हँसते हुए पूछा--
पूजा में कैसा रहेगा सेंहुड़ का फूल?
गली में भूँकते हुए कुत्ते से कहा--
'ख़ुश रह चितकबरा,
ख़ुश रह!'
और निकल गया बाहर


किधर?
क्यों?
कहाँ जा रहा था वह--
अब मीडिया में इसी पर बहस है

उधर हुआ क्या
कि ज्यों ही वह पहुँचा मरखहिया मोड़
कहीं पीछे से एक भोंपू की आवाज़ आई
और कहते हैं-- क्योंकि देखा किसी ने नहीं--
उसे कुचलती चली गई

अब यह हत्या थी
या आत्महत्या--इसे आप पर छोड़ता हूँ
वह तो अब सड़क के किनारे
चकवड़ घास की पत्तियों के बीच पड़ा था
और उसके होंठों में दबी थी
एक हल्की-सी मुस्कान!

उस दिन वह ख़ुश था।

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...