Tuesday, September 25, 2018

कोई अधूरा पूरा नहीं होता / विनोद कुमार शुक्ल

कोई अधूरा पूरा नहीं होता
और एक नया शुरू होकर
नया अधूरा छूट जाता
शुरू से इतने सारे
कि गिने जाने पर भी अधूरे छूट जाते

परंतु इस असमाप्त –
अधूरे से भरे जीवन को
पूरा माना जाए, अधूरा नहीं
कि जीवन को भरपूर जिया गया

इस भरपूर जीवन में
मृत्यु के ठीक पहले भी मैं
एक नई कविता शुरू कर सकता हूं
मृत्यु के बहुत पहले की कविता की तरह
जीवन की अपनी पहली कविता की तरह

किसी नए अधूरे को अंतिम न माना जाए ।

Monday, September 24, 2018

अंधराता / इक़तिदार जावेद

मैं पर्दा गिराने लगा हूँ
पलक से पलक को
मिलाने लगा हूँ
ज़माना मिरे ख़्वाबों में के
रोने लगा है
मैं ऊँटों को ले आऊँ
आख़िर कहाँ जा के चरने लगे हैं
जहाँ पर
परिंदे परों को नहीं खोलते हैं
जहाँ सरहदें हैं फ़लक जैसी क़ाएम
वहाँ पाँव धरने लगे हैं
मैं ऊँटों को ले आऊँ वापस
मैं भेड़ों को दूह लूँ
कई माओं की छातियाँ
छिपकिली की तरह
सूखे सीने की छत से
इक अर्से से लटकी हुई हैं
उन्हें जा के मोह लूँ
कई फ़ाख़ताएँ
जो निकली थीं कह कर
कि आएँगी वापस
चमकती दोपहरों से पहले
वो मर्ग-आसा अंधे ख़लाओं में
भटकी हुई हैं
गधे वाला
बे-वज़न रूई को लादे हुए
शहर से लौट आया है
हल्की थी रूई
बहुत भारी दिन था
तला-दोज़ ताजिर ने मोती भी
लाने का उस से कहा था
जो रंगीं उरूसाना जोड़े में जड़ने हैं
नादाँ
दुल्हन को भी मालूम है
तेज़ बारिश तो होनी है
ओले तो पड़ने हैं
नाज़ुक सी टहनी पे झूला है
झूले की रस्सी है नाज़ुक
सो रस्सी में बल आख़िर-कार पड़े हैं
अंधराता बढ़ने लगा है
मछेरे को दरिया से वापस भी आना है
तन्नूर में गीली शाख़ें जलानी हैं
तन्नूर की तरह
ख़्वाबों-भरी जल रही है
उसे भी कुशादा भरे बाज़ुओं में तो आना है!!

घरेलू स्त्री / ममता व्यास

जिन्दगी को ही कविता माना उसने जब जैसी, जिस रूप में मिली खूब जतन से पढ़ा, सुना और गुना... वो नहीं जानती तुम्हारी कविताओं के नियम लेकिन उ...